डॉक्टर,भगवान का दूसरा रूप होतें हैं, इस उक्ति को डॉ.तपन ने सच कर दिखाया
डॉ तपन कुमार लाहिड़ी का जन्म कोलकाता में हुआ था। उन्होंने सन 1969 में हृदय की शल्यचिकित्सा में इंग्लैण्ड के रॉयल क्कोलेज ऑफ सर्जन्स से फेलो रहे।
डॉक्टर भगवान का दूसरा रूप होते हैं। डॉक्टर धरती का भगवान् होतें हैं । इस युक्ति को देश के जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ.तपन कुमार लाहिड़ी ने अपनी चिकित्सीय सेवा से सच साबित कर दिया है। उनकी बदौलत लाखों मरीजों के दिल से धड़क रहे हैं । उन्होंने कभी भी आम अथवा विआईपी मरीज में कोई फर्क नहीं किया बल्कि समान रूप से सबों का इलाज किया । वहीं दूसरी ओर चिकित्सकों के फीस सुरसा की मुंह की तरह दिन ब बढ़ते चले जा रहें हैं। मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल के नाम क्या कुछ हो रहा है ? यह बात किसी से छुपी नहीं रह गई है। ऐसे में तपन कुमार लाहिड़ी की चिकित्सीय सेवा से देश भर के चिकित्सकों को सबक लेने की जरूरत है । उन्होंने अब तक का जीवन हृदय रोगियों को समर्पित कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपनी चिकित्सीय सेवा के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि एक चिकित्सक को कैसा होना चाहिए ? रोगियों के प्रति उसका कर्तव्य कैसा होना चाहिए ?
डॉ तपन कुमार लाहिड़ी का जन्म कोलकाता में हुआ था। उन्होंने सन 1969 में हृदय की शल्यचिकित्सा में इंग्लैण्ड के रॉयल क्कोलेज ऑफ सर्जन्स से फेलो रहे। सन 1972 में उसी संस्थान से वक्ष-शल्यचिकित्सा में एम सी-एच किया। इसके बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में शिक्षण आरम्भ किया। वहाँ वे हृदय विभाग मे रीडर, सहायक प्राध्यापक, प्राध्यापक, और विभागाध्यक्ष रहे।वहाँ से सन 2003 में वे सेवानिवृत हुए। उसके बाद वे अतिथि प्राध्यापक नियुक्त हुए। इसके लिये वे कोई वेतन नहीं लेते और अपनी सेवाएँ मानव सेवा के लिये निःशुल्क देने लगे। 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। वे चिकित्सा सेवा से ऐसा जुड़ गए कि गृहस्थी बसाई ही नहीं । वे अविवाहित हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर में विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराये गये आवास में आज भी सन्त की तरह रहते हैं। चौकी पर सोते हैं। नियत समय पर घर से कार्यस्थल पैदल जाते हैं और रोगियों को देखते हैं। अपने पेंशन का भी एक हिस्सा बीएचयू को दान दे देते हैं। बनारस के लोग उन्हें देवता की तरह मानते हैं। वे इतने स्वाभिमानी और राजनीति आदि से निर्लिप्त हैं कि जनवरी 2018 में अपने प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ से भी उन्होंने मिलने से मना कर दिया था।
डॉ कुमार लाहिड़ी को आज भी एक हाथ में बैग, दूसरे में काली छतरी लिए हुए पैदल घर या बीएचयू हास्पिटल की ओर जाते हुए देखा जा सकता है। सचमुच धरती के भगवान जैसे डॉ लहरी वह चिकित्सक हैं, जो वर्ष 1994 से ही अपनी पूरी तनख्वाह गरीबों को दान करते रहे हैं। अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें जो पेंशन मिलती है, उसमें से उतने ही रुपए लेते हैं, जिससे वह दोनो वक्त की रोटी खा सकें। बाकी राशि बीएचयू कोष में इसलिए छोड़ देते हैं कि उससे वहां के गरीबों का भला होता रहे। उन्हें किसी भी दिन शहर के अन्नपूर्णा होटल में पच्चीस रुपए की थाली का खाना खाते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही वह आज भी बीएचयू में अपनी चिकित्सा सेवा निःशुल्क जारी रखे हुए हैं। डॉ लहरी को आज भी एक हाथ में बैग, दूसरे में काली छतरी लिए हुए पैदल घर या बीएचयू हास्पिटल की ओर जाते हुए देखा जा सकता है। वह इतने स्वाभिमानी और अपने पेशे के प्रति इतने समर्पित रहते है कि कभी उन्होंने बीएचयू के बीमार कुलपति को भी उनके घर जाकर देखने से मना कर दिया था।
ऐसे ही डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है। तमाम चिकित्सकों से मरीज़ों के लुटने के किस्से तो आए दिन सुनने को मिलते हैं लेकिन डॉ. लहरी देश के ऐसे डॉक्टर हैं, जो मरीजों का निःशुल्क इलाज करते हैं। अपनी इस सेवा के लिए डॉ. लहरी को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार 'पद्म श्री' से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ लहरी ने सन् 1974 में प्रोफेसर के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपना करियर शुरू किया था और आज भी वह बनारस में किसी देवदूत से कम नहीं हैं। बनारस में उन्हें लोग साक्षात भगवान की तरह जानते-मानते हैं। जिस ख्वाब को संजोकर मदन मोहन मालवीय ने बीएचयू की स्थापना की, उसको डॉ लहरी आज भी जिन्दा रखे हुए हैं। वर्ष 2003 में बीएचयू से रिटायरमेंट के बाद से भी उनका नाता वहां से नहीं टूटा है। आज, जबकि ज्यादातर डॉक्टर चमक-दमक, ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं, लंबी-लंबी मंहगी कारों से चलते हैं, मामूली कमीशन के लिए दवा कंपनियों और पैथालॉजी सेंटरों से सांठ-गांठ करते रहते हैं, वही मेडिकल कॉलेज में तीन दशक तक पढ़ा-लिखाकर सैकड़ों डॉक्टर तैयार करने वाले डॉ लाहिड़ी के पास खुद का चारपहिया वाहन नहीं है। उनमें जैसी योग्यता है, उनकी जितनी शोहरत और इज्जत है, चाहते तो वह भी आलीशान हास्पिटल खोलकर करोड़ों की कमाई कर सकते थे लेकिन वह नौकरी से रिटायर होने के बाद भी स्वयं को मात्र चिकित्सक के रूप में गरीब-असहाय मरीजों का सामान्य सेवक बनाए रखना चाहते हैं। वह आज भी अपने आवास से अस्पताल तक पैदल ही आते जाते हैं। उनकी बदौलत आज लाखों ग़रीब मरीजों का दिल धड़क रहा है, जो पैसे के अभाव में महंगा इलाज कराने में लाचार थे। गंभीर हृदय रोगों का शिकार होकर जब तमाम ग़रीब मौत के मुंह में समा रहे थे, तब डॉ. लाहिड़ी ने फरिश्ता बनकर उन्हें बचाया।
डॉ लाहिड़ी जितने अपने पेशे के साथ प्रतिबद्ध हैं, उतने ही अपने समय के पाबंद भी। आज उनकी उम्र लगभग 75 साल हो चुकी है लेकिन उन्हें देखकर बीएचयू के लोग अपनी घड़ी की सूइयां मिलाते हैं। वे हर रोज नियत समय पर बीएचयू आते हैं और जाते हैं। रिटायर्ड होने के बाद विश्वविद्यालय ने उन्हें इमेरिटस प्रोफेसर का दर्जा दिया था। वह वर्ष 2003 से 2011 तक वहाँ इमेरिटस प्रोफेसर रहे। इसके बाद भी उनकी कर्तव्य निष्ठा को देखते हुए उनकी सेवा इमेरिटस प्रोफेसर के तौर पर अब तक ली जा रही है। जिस दौर में लाशों को भी वेंटीलेटर पर रखकर बिल भुनाने से कई डॉक्टर नहीं चूकते, उस दौर में इस देवतुल्य चिकित्सक की कहानी किसी भी व्यक्ति को श्रद्धानत कर सकती है।
रिटायर्ड होने के बाद भी मरीजों के लिए दिलोजान से लगे रहने वाले डॉ. टीके लहरी को ओपन हार्ट सर्जरी में महारत हासिल है। वाराणसी के लोग उन्हें महापुरुष कहते हैं। अमेरिका से डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद 1974 में वह बीएचयू में 250 रुपए महीने पर लेक्चरर नियुक्त हुए थे। गरीब मरीजों की सेवा के लिए उन्होंने शादी तक नहीं की। सन् 1997 से ही उन्होंने वेतन लेना बंद कर दिया था। उस समय उनकी कुल सैलरी एक लाख रुपए से ऊपर थी। रिटायर होने के बाद जो पीएफ मिला, वह भी उन्होंने बीएचयू के लिए छोड़ दिया। डॉ. लाहिड़ी बताते हैं कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें अमेरिका के कई बड़े हॉस्पिटल्स से ऑफर मिला, लेकिन वह अपने देश के मरीजों की ही जीवन भर सेवा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं। वह प्रतिदिन सुबह छह बजे बीएचयू पहुंच जाते हैं और तीन घंटे ड्यूटी करने के बाद वापस घर लौट आते हैं। इसी तरह हर शाम अपनी ड्यूटी बजाते हैं। इसके बदले वह बीएचयू से आवास के अलावा और कोई सुविधा नहीं लेते हैं। सच्चे अर्थों में डॉक्टर लाहिड़ी सहजता, सरलता, सेवा और त्याग के प्रतिमूर्ति हैं। उनका अब तक का जीवन सकल समाज के लिए अनुकरणीय है।
