बाबा आमटे का संपूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों के कल्याण को समर्पित रहा था

(9 फरवरी, महान सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आमटे की 18 वीं पुण्यतिथि पर विशेष)

बाबा आमटे का संपूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों के कल्याण को समर्पित रहा था

 महान  स्वाधीनता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता  सह गांधीवादी विचारक  बाबा आमटे का संपूर्ण जीवन कुष्ठ रोगों के कल्याण को समर्पित रहा था।बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों के कल्याण के लिए जमी जमाई वकालत छोड़ कर  चंद्रपुर में ‘आनंदवन’ की स्थापना कर उन्हें सम्मानजनक जीवन प्रदान किया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर आजीवन गांधीवाद को न सिर्फ अपनाया बल्कि आजीवन प्रचार प्रसार भी किया। इसलिए उन्हें आजाद भारत का  'आधुनिक गांधी'  के रूप में भी जाना जाता है।  जिस काल खंड में उन्होंने कुष्ठ रोगियों के कल्याण के लिए अपना कदम आगे बढ़ाया था, कई तरह की भ्रांतियां इस रोग से संबंधित समाज में फैली हुई थी, लेकिन सभी भ्रांतियों को नजरअंदाज कर  जो कुछ भी किया,सदा याद किया जाता रहेगा ।  उन्होंने  कुष्ठ रोगियों की न सिर्फ सेवा की बल्कि और उन सबों के पुनर्वास के लिए जो कदम उठाया, उसकी प्रासंगिकता आज तक बनी हुई है। कुष्ठ रोग के विषय में कई ऐसी भ्रांतियां फैली हुई थी कि अगर किसी को यह रोग लग जाए, तो उसे अपने ही परिवार और समाज से अलग हो जाना पड़ता था ।  एक और जहां कुष्ठ रोगी अपने रोग से परेशान थे, वहीं परिवार और समाज से भी उपेक्षित हो रहे थे। ऐसे समय में बाबा आमटे ने उन सबों का थाम कर  अद्वितीयय उदाहरण प्रस्तुत किया था। इसके साथ ही उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए वकीलों को  संगठित करने का भी काम किया था। ‌फलस्वरूप वे ब्रिटिश हुकूमत की आंखें किरकिरी भी  बन गए थे । उन्होंने इसकी परवाह किए बिना भारत के स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 

  बाबा आमटे का  जन्म 26 दिसंबर 1914 को हिंगनघाट, महाराष्ट्र में हुआ था। उनका पूरा नाम मुरलीधर देवीदास आमटे था। लेकिन बचपन से ही उन्हें बाबा - बाबा कहकर बुलाया जाता था। आगे चलकर यही उपनाम से वे लोकप्रिय हुए । वे एक समृद्ध ज़मींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे, लेकिन उन्होंने विलासिता का जीवन छोड़कर समाज सेवा का रास्ता चुना। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई  पूरी कर वकील बने थे। उन्होंने कुष्ठ रोगियों की ऐसी खिदमत की थी कि उन्हें उनके ही जीवन काल में कुष्ठ रोगियों के मसीहा के अलंकार जाना जाने लगा था।  उन्होंने कुष्ठ रोगियों  के बदतर  जीवन को देखकर महसूस किया कि कुष्ठ रोगियों को समाज से बाहर कर दिया जाता है। यह पूरी तरह गलत परंपरा है। फिर उन्होंने अंत: प्रेरणा से कुछ रोगियों के कल्याण का संकल्प लिया। फिर उन्होंने अपना कदम कभी पीछे नहीं किया ।  आगे चलकर 1949 में उन्होंने  आनंदवन, अशोकवन, और सोमनाथ जैसे केंद्रों की स्थापना की थी। इन तीनों केन्द्रों में कुष्ठ रोगियों को मुफ्त इलाज के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनने की ट्रेनिंग दी जाती थी।
  उनका मत था कि दान विनाश करता है, कर्म निर्माण करता है। वे आजीवन इसी मूल मंत्र को मान  कर आगे बढ़ते रहे थे। प्रारंभिक दिनों में उनके उक्त विचार के लिए उनकी जमकर आलोचना हुई थी। लेकिन उन्होंने आलोचना पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया था। बल्कि वे उस  मूल मंत्र को जीवन का अंतिम सत्य मान कर कुष्ठ रोगियों के कल्याण के लिए निरंतर कदम बढ़ते रहे थे। तब लोगों ने मानना शुरू कर दिया था कि  बाबा आमटे अपने विचार के बिल्कुल पक्के हैं ।  तब उन्हें जो सम्मान सामाजिक तौर पर मिलना चाहिए, मिलना प्रारंभ हुआ था। इससे पूर्व उन्हें अपने रिश्तेदारों से भी दूर होना पड़ा था। लेकिन वे इस दूरी की भी परवाह  किए बिना कुष्ठ रोगों को गले लगाकर जो कुछ किए, भारतीय इतिहास के लिए ऐसा समाज सेवा करने वाले पहला व्यक्ति बन गए थे। 
 इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण और समाज के लिए जो कुछ भी किया अपने आप में अद्वितीय था। उन्होंने पर्यावरण प्रदूषण की चिंता से भारत सहित विश्व को अवगत कराया था। ‌उन्होंने 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के माध्यम से देश की एक नई तस्वीर प्रस्तुत की थी। उनका मत था पर्यावरण और विस्थापन की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए। ‌ उन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन के माध्यम से आदिवासियों के अधिकारों के लिए जमकर संघर्ष किया था। उन्होंने संघर्ष कर विस्थापित आदिवासियों को उसका हक भी दिलवाया था । 
 वे स्वतंत्र भारत में बढ़ती सांप्रदायिकता और जात-पात से बहुत दुखी थे। वे देश के चतुर्दिक विकास के लिए सांप्रदायिकता और जात-पात को एक बड़ी रूप के रूप में देखते थे । देश के विकास के लिए देश की एकता और अखंडता बहुत जरूरी है । इसलिए उन्होंने 1980 में  भारत जोड़ो यात्रा कर देशवासियों को यह समझाने का प्रयास किया कि देश की एकता और अखंडता के लिए हम सभी मिलजुल कर रहे हैं। हम सभी भाईचारे के साथ रहें। तभी देश सुरक्षित रहेगा। तभी देश की आजादी का  अर्थ सार्थक हो  पाएगा। उन्होंने  'भारत जोड़ो' यात्रा को एक आंदोलन का रुप प्रदान किया था।  भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से उन्होंने संपूर्ण देश की यात्रा कर  हजारों जन सभाओं को संबोधित किया था।  उनके इस देशव्यापी आंदोलन को संपूर्ण देश में समर्थन मिला था। तब सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने भी माना  कि  बाबा आमटे की भारत जोड़ो यात्रा देश की एकता अखंडता के लिए बहुत ही जरूरी है । सत्ता पक्ष और विपक्ष नेताओं ने भी उनके सुर में अपना सुर मिलाया था। 
 ध्यातव्य है कि बाबा आमटे के  पिता देवीदास हरबाजी आम्टे शासकीय सेवा में थे। उनका बचपन बहुत ही ठाट-बाट से बीता। वे सोने के पालने में सोते थे, और चांदी की चम्मच से उन्हें खाना खिलाया जाता था। बाबा आम्टे के मन में सबके प्रति समान व्यवहार और सेवा की भावना बचपन से ही थी। वे नौ वर्ष की उम्र में  एक अंधे भिखारी को देखकर इतने द्रवित हुए और  ढेरों रुपए उसकी झोली में डाल दिए थे। वे बचपन से ही दयालु प्रकृति के बालक थे ।  जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई उनमें करूणा  भाव उसी रूप में विकसित होता गया। वे बचपन से ही सहज सरल प्रकृति के  थे ।  उनका यह स्वभाव जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा था। इतनी विलासिता पूर्ण तरीके के बीच उनका लालन-पालन हुआ था, लेकिन उनमें भी  इस विलासिता पूर्ण लालन पालन का तनिक भी घमंड नहीं था। यह उन्हें सबसे अलग करता है। बाबा आम्टे का विवाह भी एक सेवा-धर्मी युवती साधना से विचित्र परिस्थितियों में हुआ था। बाबा आम्टे को दो संतान प्राप्त हुई, प्रकाश आम्टेएवं विकास आम्टे के रूप में।
  महात्मा गांधी के आह्वान पर वे स्वाधीनता आंदोलन में कूदे थे। 
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल भी गए थे । स्वाधीनता सेनानियों के मुकदमें लड़ने के लिए उन्‍होंने अपने साथी वकीलों को संगठित किया था। इन्‍ही प्रयासों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्‍हे गिरफ्तार कर लिया था। यह गिरफ्तारी उनके जीवन के लिए एक टर्निंग पॉइंट के समान था । यहीं उन्होंने वरोरा में कीड़ों से भरे कुष्‍ठ रोगी को देखकर उनके जीवन की धारा बदल गई। उन्‍होंने अपना वकालती चोगा और सुख-सुविधा वाली जीवन शैली त्‍यागकर कुष्‍ठरोगियों और दलितों के बीच उनके कल्‍याण के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने कुष्ठ की चिकित्सा का प्रशिक्षण तो लिया ही, अपने शरीर पर कुष्ठ निरोधी औषधियों का परीक्षण भी किया था। 1951 में उनकी संस्था 'आनंदवन' की रजिस्ट्री हुई थी। सरकार से इस कार्य के विस्तार के लिए भूमि मिली थी। बाबा आम्टे के प्रयत्न से दो अस्पताल बने, विश्वविद्यालय स्थापित हुआ, एक अनाथालय खोला गया, नेत्रहीनों के लिए स्कूल बना और तकनीकी शिक्षा की भी व्यवस्था हुई। 'आनंदवन' आश्रम अब पूरी तरह आत्मनिर्भर है और लगभग पाँच हज़ार व्यक्ति उससे आजीविका चला रहे हैं।  नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर बांध निर्माण और इसके फलस्‍वरूप हजारों आदिवासियों के विस्‍थापन का विरोध करने के लिए 1989 में बाबा आम्‍टे ने बांध बनने से डूब जाने वाले क्षेत्र में निजी बल नामक एक छोटा आश्रम बनाया।
  बाबा आमटे के अखिल भारतीय स्तर पर किए गए सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें 1971 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया था।  इसके साथ उन्हें 1978 में राष्‍ट्रीय भूषण, 1983 में अमेरिका का डेमियन डट्टन पुरस्कार, 1985 में मैग्‍सेसे पुरस्‍कार, 1986 में पद्म विभूषण, 1988 में घनश्यामदास बिड़ला अंतरराष्ट्रीय सम्मान, 1988 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सम्मान, 1990 में अमेरिकी टेम्पलटन पुरस्कार, 1991 में ग्लोबल 500 संयुक्त राष्ट्र सम्मान, 1992 में राइट लाइवलीहुड सम्मान, 1999 में गाँधी शांति पुरस्कार, 2004 में महाराष्ट्र भूषण सम्मान प्रदान किया गया था।