कथाकार रांगेय राघव सामान्य जन के एक रचनाकार थे 

(17 जनवरी, महान कथाकार रांगेय राघव की 103 वीं जयंती पर विशेष)

कथाकार रांगेय राघव सामान्य जन के एक रचनाकार थे 

रांगेय राघव  सामान्य जन के एक रचनाकार थे। हिंदी भाषी नहीं होने के बावजूद  उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में जो काम किया, सदा हिंदी साहित्य को गौरवान्वित करता रहेगा ।  उनका विपुल साहित्य देश के आमजन की आवाज को गूंजीत करता रहेगा।  उनका संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य को समर्पित रहा था।  वे हिंदी के उन विशिष्ट और बहुमुखी प्रतिभाशाली रचनाकारों में से रहे थे । वे मात्र इस धरा पर 39 वर्ष ही रह पाए थे । इतने कम समय में उन्होंने जो सृजन का काम किया अपने आप में एक रिकॉर्ड सा बन गया । उन्होंने एक सफल उपन्यासकार, कहानीकार निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि एवं रिपोर्ताज लेखक के रूप में स्वयं को प्रतिस्थापित कर दिया था। उन्होंने अपने रचनात्मक कौशल से हिंदी की महान सृजनशीलता के दर्शन करा दिया। ।  
   उन्होंने  हिंदी साहित्य के विभिन्न धरातलों पर युगीन सत्य से उपजा महत्त्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराया। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर जीवनी परक उपन्यासों का ढेर लगा दिया। कहानी के पारंपरिक ढांचे में बदलाव लाते हुए नवीन कथा प्रयोगों द्वारा उसे मौलिक कलेवर में विस्तृत आयाम दिया। उन्होंने रिपोर्ताज लेखन, जीवन चरितात्मक उपन्यास और महायात्रा गाथा की परंपरा डाली। विशिष्ट कथाकार के रूप में उनकी सृजनात्मक संपन्नता प्रेमचंदोत्तर रचनाकारों के लिए बड़ी चुनौती बनी। इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद हिंदी क्षेत्र में जो नाम उनकी कृतियां का होना चाहिए, नहीं हो पाया।  यह बात समझ से परे है। जहां तक मेरी वैचारिक दृष्टि जाती है, हिंदी आलोचकों ने उन्हें अपनी आलोचना से दूरी रखा। अन्यथा उनकी रचनाएं हिंदी पाठकों से इतनी दूरी बनाकर नहीं रह पाती।
  रांगेय राघव का मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य है, लेकिन उन्होंने अपना साहित्यिक नाम रांगेय राघव रखा। इनका जन्म 17 जनवरी, 1923 को श्री रंगाचार्य के घर हुआ । इनकी माता श्रीमती कनक वल्ली और पत्नी श्रीमती सुलोचना है इनका परिवार मूलरूप से तिरुपति, आंध्र प्रदेश का निवासी था। वैर’ गांव के सहज, सादे ग्रामीण परिवेश में उनका रचनात्मक साहित्य ने अपना आकार गढ़ना शुरू किया। जब उनकी सृजन-शक्ति अपने प्रकाशन का मार्ग ढूंढ़ रही थी,  तब देश स्वाधीनता आंदोलन के अंतिम चरण में था। देश आजादी की ओर बहुत तेजी के साथ पढ़ रहा था। ऐसे वातावरण में उन्होंने अनुभव किया कि अपनी मातृभाषा हिंदी से ही देशवासियों के मन में देश के प्रति निष्ठा और स्वतंत्रता का संकल्प जगाया जा सकता है। इस संकल्प के साथ उन्होंने हिंदी के क्षेत्र में प्रवेश किया।  उनकी सृजन-यात्रा सर्वप्रथम चित्रकला में प्रस्फुटित हुई। 1936 - 37 के आस-पास जब वे साहित्य की ओर उन्मुख हुए तो  उन्होंने सबसे पहले कविता के क्षेत्र में कदम रखा। वे  मूलतः एक संवेदनशील कवि थे।  उनकी कविताएं मर्म को छूती हैं । मेरा ऐसा मानना है कि अगर वे कविता के क्षेत्र में ही अग्रसर  होते तो निश्चित तौर पर एक जन कवि के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल होते।  लेकिन स्वाधीनता आंदोलन, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों  को ध्यान में रखकर उन्होंने कथा के माध्यम से समाज को जागृत करने के लिए संकल्प लिया। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति का अंत भी मृत्यु पूर्व लिखी गई उनकी एक कविता से ही हुआ। उनका साहित्य सृजन भले ही कविता से शुरू हुआ हो, लेकिन उन्हें प्रतिष्ठा मिली एक गद्य लेखक के रूप में। 
 रांगेय राघव का एक उपन्यास घरौंदा नाम से 1946 में प्रकाशित  हुआ था। यह उपन्यास देश भर में चर्चित हुआ ।  वे इस उपन्यास के जरिए एक  प्रगतिशील कथाकार के रूप में चर्चित हुए।  इसके बाद तो उन्होंने राजा की उत्पत्ति, चंद्रमा, पार्वती, शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ, मार्तंड,  दक्ष प्रजापति, स्वरोविष, शनैश्चर, सुंद और उपसुंद, नारद और पर्वत, काव्य, सोम, केसरी, दशाश्वमेधिक तीर्थ, सुधा तीर्थ, अहल्या तीर्थ, जाबालि-गोवर्धन तीर्थ, गरुड़ तीर्थ, श्वेत तीर्थ, शुक्र तीर्थ, इंद्र तीर्थ, पौलस्त्य तीर्थ, अग्नि तीर्थ, ऋणमोचन तीर्थ, पुरुरवस् तीर्थ, वृद्धा-संगम तीर्थ, इलातीर्थ, नागतीर्थ, मातृतीर्थ, शेषतीर्थ), दस प्रतिनिधि कहानियां, गदल तथा अन्य कहानियां, प्राचीन यूनानी कहानियाँ, प्राचीन ब्राह्मण कहानियां, प्राचीन ट्यूटन कहानियां, प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ, संसार की प्राचीन कहानियां आदि रच कर हिंदी साहित्य को गौरवान्वित कर दिया।
  उनका विपुल साहित्य उनकी अभूतपूर्व लेखन क्षमता को दर्शाता है। वे एक विलक्षण प्रतिभा के लेखक की श्रेणी में आते थे।  उनके  संदर्भ में कहा जाता रहा है कि ‘जितने समय में कोई पुस्तक पढ़ेगा उतने में वे लिख सकते थे।'  वस्तुत:  उन्हें कृति की रूपरेखा बनाने में समय लगता था, लिखने में नहीं।  रांगेय राघव सामान्य जन के ऐसे रचनाकार रहें, जो प्रगतिवाद का लेबल चिपकाकर सामान्य जन का दूर बैठे चित्रण नहीं करते, बल्कि उनमें बसकर करते हैं। समाज और इतिहास की यात्रा में वे स्वयं सामान्य जन बन जाते हैं। रांगेय राघव ने वादों के चौखटे से बाहर रहकर सही मायने में प्रगतिशील रवैया अपनाते हुए अपनी रचनाधर्मिता से समाज संपृक्ति का बोध कराया। समाज के अंतरंग भावों से अपने रिश्तों की पहचान करवाई।
     1942  में वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित दिखे थे । इसके बावजूद उन्हें वादग्रस्तता से चिढ़ थी। उनकी चिंतन प्रक्रिया गत्यात्मक थी। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता ग्रहण करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें उसकी शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा नहीं था। साहित्य में वे न किसी वाद से बंधे, न विधा से। उन्होंने अपने ऊपर मढ़े जा रहे मार्क्सवाद, प्रगतिवाद और यथार्थवाद का विरोध किया। उन्होंने प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का कभी भी आश्रय नहीं लिया और न प्रगतिवाद के चोले में अपने को यांत्रिक बनाया। उन्होंने केवल इतिहास को, जीवन को, मनुष्य की पीड़ा को और मनुष्य की उस चेतना को, जो अंधकार से जूझने की शक्ति रखती है, उसे ही सत्य माना। उन्होंने  जीवन की जटिलताओं   में खोए हुए मनुष्य की, मनुष्यत्व की पुनर्रचना का प्रयत्न किया, क्योंकि मनुष्यत्व के छीजने की व्यथा उन्हें बराबर सालती थी। उनकी रचनाएं समाज को बदलने का दावा नहीं करतीं, लेकिन उनमें बदलाव की आकांक्षा जरूर हैं। इसलिए उनकी रचनाएं अन्य रचनाकारों की तरह व्यंग्य या प्रहारों में खत्म नहीं होती और न ही दार्शनिक टिप्पणियों में समाप्त होती हैं, बल्कि वे मानवीय वस्तु के निर्माण की ओर उद्यत होती हैं।   साथ ही इस मानवीय वस्तु का निर्माण उनके यहां  परिस्थिति और ऐतिहासिक चेतना के द्वंद से होता है। उन्होंने लोग-मंगल से जुड़कर युगीन सत्य को भेदकर मानवीयता को खोजने का प्रयत्न किया तथा मानवतावाद को अवरोधक बनी हर शक्ति को परास्त करने का भरसक प्रयत्न भी। कुछ प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों के उत्तर रांगेय राघव ने अपनी कृतियों के माध्यम से दिए। इसे हिंदी साहित्य में उनकी मौलिक देन के रूप में माना गया। उन्होंने भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ के उत्तर में ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘आनंद मठ’ के उत्तर में उन्होंने ‘विषाद मठ’ लिखा। प्रेमचंदोत्तर कथाकारों की कतार में अपने रचनात्मक वैशिष्ट्य, सृजन विविधता और विपुलता के कारण वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे।
  रांगेय राघव ने उपन्यास लेखन के क्षेत्र में जो काम किया, सदा देशवासियों का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।  उनके उनके उपन्यासों में विषाद मठ, उबाल, राह न रुकी, बारी बरणा खोल दो, देवकी का बेटा, रत्ना की बात, भारती का सपूत, यशोधरा जीत गयी, घरौंदा, लोई का ताना, लखिमा की आँखें, मेरी भव बाधा हरो, कब तक पुकारूं,पक्षी और आकाश, चीवर, राई और पर्वत, आख़िरी आवाज़, बन्दूक और बीन आदि शामिल हैं।
 उनका समग्र साहित्य  जन सामान्य को समर्पित रहा था ।  वे खुद एक साधारण परिवार के थे। उन्हें उनके ही जीवन काल में इतनी लोकप्रियता मिलने के बावजूद वे उतने ही सहज, सरल और एक सामान्य जन बन कर ही रहे थे। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया था। आज भी उनकी कृतियां जन सामान्य लोगों के लिए संघर्षरत है। बस जरूरत है, उनकी रचनाओं को जन-जन तक पहुंचाने की।